[1] यह सुन तेमानवासी एलिफाज़ ने इस स्थिति पर अपने विचार प्रस्तुत किए
[2] “अय्योब, यदि मैं तुमसे कुछ कहने का ढाढस करूं, क्या तुम चिढ़ हो जाओगे? किंतु कुछ न कहना भी असंभव हो रहा है.
[3] यह सत्य है कि तुमने अनेकों को चेताया है, तुमने अनेकों को प्रोत्साहित है.
[4] तुम्हारे शब्दों से अनेकों के लड़खड़ाते पैर स्थिर हुए हैं; तुमसे ही निर्बल घुटनों में बल-संचार है.
[5] अब तुम स्वयं उसी स्थिति का सामना कर रहे हो तथा तुम अधीर हो रहे हो; उसने तुम्हें स्पर्श किया है और तुम निराशा में डूबे हुए हो!
[6] क्या तुम्हारे बल का आधार तुम्हारा परमेश्वर के प्रति श्रद्धा-भय-भाव नहीं है. तथा क्या तुम्हारी आशा का आधार तुम्हारी चालचलन में खरा नहीं?
[7] “अब यह सत्य याद न होने देना क्या कभी कोई अपने निर्दोष होने के कारण नष्ट हुए? अथवा कहां सज्जन को नष्ट किया गया है?
[8] अपने अनुभव के आधार पर मैं कहूंगा, जो पाप में हल चलाते हैं तथा जो संकट बोते हैं, वे उसी की उपज एकत्र करते हैं.
[9] परमेश्वर के श्वास मात्र से वे नष्ट हो जाते हैं; उनके कोप के विस्फोट से वे नष्ट हो जाते हैं,
[10] सिंह की दहाड़, हिंसक सिंह की गरज, बलिष्ठ सिंहों के दांत टूट जाते हैं.
[11] भोजन के अभाव में सिंह नष्ट हो रहे हैं, सिंहनी के बच्चे इधर-उधर जा चुके हैं.
[12] “एक संदेश छिपते-छिपाते मुझे दिया गया, मेरे कानों ने वह शांत ध्वनि सुन ली.
[13] रात्रि में सपनों में विचारों के मध्य के दृश्यों से, जब मनुष्य घोर निद्रा में पड़े हुए होते हैं,
[14] मैं भय से भयभीत हो गया, मुझ पर कंपकंपी छा गई, वस्तुतः मेरी समस्त हड्डियां हिल रही थी.
[15] उसी अवसर पर मेरे चेहरे के सामने से एक आत्मा निकलकर चली गई, मेरे रोम खड़े हो गए.
[16] मैं स्तब्ध खड़ा रह गया. उसके रूप को समझना मेरे लिए संभव न था. एक रूप को मेरे नेत्र अवश्य देख रही थी. वातावरण में पूर्णतः सन्नाटा था, तब मैंने एक स्वर सुना
[17] ‘क्या मानव जाति परमेश्वर की दृष्टि में धर्मी हो सकता है? क्या रचयिता की परख में मानव पवित्र हो सकता है?
[18] परमेश्वर ने अपने सेवकों पर भरोसा नहीं रखा है, अपने स्वर्गदूतों पर वह दोष आरोपित करते हैं.
[19] तब उन पर जो मिट्टी के घरों में निवास करते, जिनकी नींव ही धूल में रखी हुई है, जिन्हें पतंगे-समान कुचलना संभव है, कितना और अधिक न होगा!
[20] प्रातःकाल से लेकर संध्याकाल तक उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर दिया जाता है; उन्हें सदा-सर्वदा के लिए विनष्ट कर दिया जाता है और किसी का ध्यान भी उनकी ओर नहीं जाता.
[21] क्या यह सत्य नहीं कि उनके तंबुओं की रस्सियां उनके भीतर ही खोल दी जाती है? तथा बुद्धिहीनों उनकी मृत्यु हो जाती है?’