[1] एलिहू ने अपना वक्तव्य चालू रखा:
[2] “आपका विचार क्या है, क्या यह न्याय समझते हैं? क्या दावा है आपके उस कहने का, ‘मेरा धर्म परमेश्वर के धर्म से ऊपर है’?
[3] क्योंकि आप तो यही कहेंगे, ‘आप पर मेरे पाप का क्या प्रभाव पड़ता है, और पाप न करने के द्वारा मैंने क्या प्राप्त किया है?’
[4] “इसका उत्तर आपको मैं दूंगा, आपको तथा आपके मित्रों को.
[5] आकाश की ओर दृष्टि उठाओ; मेघों को अवलोकन करो, वे तुमसे ऊपर हैं.
[6] जब आप पाप कर बैठते हैं, इससे हानि परमेश्वर की कैसी होती? यदि आपके अत्याचारों की संख्या अधिक हो जाती, क्या परमेश्वर पर इसका कोई प्रभाव होता है?
[7] यदि आप धर्मी हैं, आप परमेश्वर के लिए कौन सा उपकार कर देंगे अथवा आपके इस कृत्य से आप उनके लिए कौन सा लाभ हासिल कर देंगे?
[8] आपके दुष्चरित्रता आप जैसे व्यक्ति पर ही शोभा देती है, तथा आपकी धार्मिकता मानवता के लिए योग देती है.
[9] “अत्याचारों में वृद्धि होने पर मनुष्य कराहने लगते हैं; वे बुरे काम के लिए किसी शूर की खोज करते हैं.
[10] किंतु किसी का ध्यान इस ओर नहीं जाता ‘कहां हैं परमेश्वर, मेरा रचयिता, जो निराशा के अंधकार में आशा का गीत बनकर उतर जाते हैं,
[11] रचयिता परमेश्वर ही हैं, जिनकी शिक्षा हमें पशु पक्षियों से अधिक विद्वत्ता देती है, तथा हमें आकाश के पक्षियों से अधिक बुद्धिमान बना देती है.’
[12] वहां वे सहायता की पुकार देते हैं, किंतु परमेश्वर उनकी ओर ध्यान नहीं देते, क्योंकि वे दुर्जन अपने अहंकार में डूबे हुए रहते हैं.
[13] यह निर्विवाद सत्य है परमेश्वर निरर्थक पुकार को नहीं सुनते; सर्वशक्तिमान इस ओर ध्यान देना भी उपयुक्त नहीं समझते.
[14] महोदय अय्योब, आप कह रहे थे, आप परमेश्वर को नहीं देख सकते, अनिवार्य है कि आप परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करें. आपका पक्ष उनके सामने रखा जा चुका है.
[15] इसके अतिरिक्त, परमेश्वर का कोप-दण्ड नहीं देता और न ही वह अभिमान की ओर ध्यान देते हैं,
[16] महोदय अय्योब, इसलिये व्यर्थ है आपका इस प्रकार बातें करना; आप बिना किसी ज्ञान के अपने उद्गार पर उद्गार किए जा रहे हैं.”