[1] तब स्वयं याहवेह ने तूफान में से अय्योब को उत्तर दिया:
[2] “कौन है वह, जो अज्ञानता के विचारों द्वारा मेरी युक्ति को बिगाड़ रहा है?
[3] ऐसा करो अब तुम पुरुष के भाव कमर बांध लो; तब मैं तुमसे प्रश्न करना प्रारंभ करूंगा, तुम्हें इन प्रश्नों का उत्तर देना होगा.
[4] “कहां थे तुम, जब मैंने पृथ्वी की नींव डाली थी? यदि तुममें कुछ भी समझ है, मुझे इसका उत्तर दो.
[5] यदि तुम्हें मालूम हो! तो मुझे बताओ, किसने पृथ्वी का नाप ठहराया है? अथवा, किसने इसकी माप रेखाएं निश्चित की?
[6] किस पदार्थ पर इसकी आधार स्थापित है? किसने इसकी आधार रखी?
[7] जब निशांत तारा सहगान में एक साथ गा रहे थे तथा सभी स्वर्गदूत उल्लासनाद कर रहे थे, कहां थे तुम?
[8] “अथवा किसने महासागर को द्वारों द्वारा सीमित किया, जब गर्भ से इसकी उद्भव हो रही थी.
[9] जब मैंने इसके लिए मेघ परिधान निर्मित किया तथा घोर अंधकार को इसकी मेखला बना दिया,
[10] तथा मैंने इस पर सीमाएं चिन्हित कर दीं तथा ऐसे द्वार बना दिए, जिनमें चिटकनियां लगाई गई.
[11] तथा मैंने यह आदेश दे दिया ‘तुम यहीं तक आ सकते हो, इसके आगे नहीं तथा यहां आकर तुम्हारी वे सशक्त वाली तरंगें रुक जाएंगी’?
[12] “क्या तुमने अपने जीवन में प्रभात को यह आदेश दिया है, कि वह उपयुक्त क्षण पर ही अरुणोदय किया करे,
[13] कि यह पृथ्वी के हर एक छोर तक प्रकट करे, कि दुराचारी अपने-अपने छिपने के स्थान से हिला दिए जाएं?
[14] गीली मिट्टी पर मोहर लगाने समान परिवर्तन जिसमें परिधान के सूक्ष्म भेद स्पष्ट हो जाते हैं.
[15] सूर्य प्रकाश की उग्रता दुर्वृत्तों को दुराचार से रोके रहती है, मानो हिंसा के लिए उठी हुई उनकी भुजा तोड़ दी गई हो.
[16] “अच्छा, यह बताओ, क्या तुमने जाकर महासागर के स्रोतों का निरीक्षण किया है अथवा सागर तल पर चलना फिरना किया है?
[17] क्या तुमने घोर अंधकार में जाकर मृत्यु के द्वारों को देखा है?
[18] क्या तुम्हें ज़रा सा भी अनुमान है, कि पृथ्वी का विस्तार कितनी है मुझे बताओ, क्या-क्या मालूम है तुम्हें?
[19] “कहां है प्रकाश के घर का मार्ग? वैसे ही, कहां है अंधकार का आश्रय,
[20] कि तुम उन्हें यह तो सूचित कर सको, कि कहां है उनकी सीमा तथा तुम इसके घर का मार्ग पहचान सको?
[21] यदि तुम्हें वास्तव में यह मालूम है, तब तो उस अवसर पर तुम्हारा जन्म हो चुका होगा! तब तो तुम्हारी आयु के वर्ष भी अनेक ही होंगे!
[22] “क्या तुमने कभी हिम के भंडार में प्रवेश किया है, अथवा क्या तुमने कभी हिम के भण्डारगृह देखा है,
[23] उन ओलों को जिन्हें मैंने पीड़ा के समय लिए रखा हुआ है युद्ध तथा संघर्ष के दिनों के लिए?
[24] क्या तुम्हें मालूम है कि प्रकाश का विभाजन कहां है, अथवा यह कि पृथ्वी पर पुरवाई कैसे बिखर जाती है?
[25] क्या तुम्हें मालूम है कि बड़ी बरसात के लिए धारा की नहर किसने काटी है, अथवा बिजली की दिशा किसने निर्धारित की है,
[26] कि बरसात का पानी रेगिस्तान प्रदेश में पहुंचाया जा सके, उस मरुभूमि में, जहां किसी मनुष्य का होना असंभव है,
[27] कि उजड़े और बंजर भूमि की प्यास मिट जाए तथा वहां घास के बीजों का अंकुरण प्रारंभ हो जाए?
[28] है कोई वृष्टि का जनक? अथवा कौन है ओस की बूंदें का उत्पादक?
[29] किस गर्भ से हिम का प्रसव है? तथा आकाश का पाला कहां से जन्मा है?
[30] जल पत्थर के समान कठोर हो जाता है तथा इससे महासागर की सतह एक कारागार का रूप धारण कर लेती है.
[31] “अय्योब, क्या तुम कृतिका नक्षत्र के समूह को परस्पर गूंध सकते हो, अथवा मृगशीर्ष के बंधनों को खोल सकते हो?
[32] क्या तुम किसी तारामंडल को उसकी निर्धारित कर उसके उपयुक्त स्थान पर प्रकट कर सकते हो तथा क्या तुम सप्त ऋषि को दिशा-निर्देश दे सकते हो?
[33] क्या तुम आकाशमंडल के अध्यादेशों को जानते हो, अथवा क्या तुम पृथ्वी पर भी वही अध्यादेश प्रभावी कर सकते हो?
[34] “क्या यह संभव है कि तुम अपना स्वर मेघों तक प्रक्षेपित कर दो, कि उनमें परिसीमित जल तुम्हारे लिए विपुल वृष्टि बन जाए?
[35] क्या तुम बिजली को ऐसा आदेश दे सकते हो, कि वे उपस्थित हो तुमसे निवेदन करें, ‘क्या आज्ञा है, आप आदेश दें’?
[36] किसने बाज पक्षी में ऐसी ज्ञान स्थापित की है, अथवा किसने मुर्गे को पूर्व ज्ञान की क्षमता प्रदान की है?
[37] कौन है वह, जिसमें ऐसा ज्ञान है, कि वह मेघों की गणना कर लेता है? अथवा कौन है वह, जो आकाश के पानी के मटकों को झुका सकता है,
[38] कि धूल मिट्टी का ढेला बनकर कठोर हो जाती है तथा ये ढेले भी एक दूसरे से मिल जाते हैं हो जाते हैं?
[39] “अय्योब, क्या तुम उस सिंहनी के लिए, जो अपनी कन्दरा में दुबकी बैठी है,
[40] अथवा जो झाड़ियों में घात लगाए बैठी है,
[41] और कौवों को पौष्टिक आहार कौन परोसता है, जब इसके बच्चे परमेश्वर को पुकारते हैं, तथा अपना भोजन खोजते हुए भटकते रहते हैं?