[1] याक़ूब ने अपना सफ़र जारी रखा और चलते चलते मशरिक़ी क़ौमों के मुल्क में पहुँच गया।
[2] वहाँ उस ने खेत में कुआँ देखा जिस के इर्दगिर्द भेड़-बकरियों के तीन रेवड़ जमा थे। रेवड़ों को कुएँ का पानी पिलाया जाना था, लेकिन उस के मुँह पर बड़ा पत्थर पड़ा था।
[3] वहाँ पानी पिलाने का यह तरीक़ा था कि पहले चरवाहे तमाम रेवड़ों का इन्तिज़ार करते और फिर पत्थर को लुढ़का कर मुँह से हटा देते थे। पानी पिलाने के बाद वह पत्थर को दुबारा मुँह पर रख देते थे।
[4] याक़ूब ने चरवाहों से पूछा, “मेरे भाइयो, आप कहाँ के हैं?” उन्हों ने जवाब दिया, “हारान के।”
[5] उस ने पूछा, “क्या आप नहूर के पोते लाबन को जानते हैं?” उन्हों ने कहा, “जी हाँ।”
[6] उस ने पूछा, “क्या वह ख़ैरियत से है?” उन्हों ने कहा, “जी, वह ख़ैरियत से है। देखो, उधर उस की बेटी राख़िल रेवड़ ले कर आ रही है।”
[7] याक़ूब ने कहा, “अभी तो शाम तक बहुत वक़्त बाक़ी है। रेवड़ों को जमा करने का वक़्त तो नहीं है। आप क्यूँ उन्हें पानी पिला कर दुबारा चरने नहीं देते?”
[8] उन्हों ने जवाब दिया, “पहले ज़रूरी है कि तमाम रेवड़ यहाँ पहुँचें। तब ही पत्थर को लुढ़का कर एक तरफ़ हटाया जाएगा और हम रेवड़ों को पानी पिलाएँगे।”
[9] याक़ूब अभी उन से बात कर ही रहा था कि राख़िल अपने बाप का रेवड़ ले कर आ पहुँची, क्यूँकि भेड़-बकरियों को चराना उस का काम था।
[10] जब याक़ूब ने राख़िल को मामूँ लाबन के रेवड़ के साथ आते देखा तो उस ने कुएँ के पास जा कर पत्थर को लुढ़का कर मुँह से हटा दिया और भेड़-बकरियों को पानी पिलाया।
[11] फिर उस ने उसे बोसा दिया और ख़ूब रोने लगा।
[12] उस ने कहा, “मैं आप के अब्बू की बहन रिब्क़ा का बेटा हूँ।” यह सुन कर राख़िल ने भाग कर अपने अब्बू को इत्तिला दी।
[13] जब लाबन ने सुना कि मेरा भान्जा याक़ूब आया है तो वह दौड़ कर उस से मिलने गया और उसे गले लगा कर अपने घर ले आया। याक़ूब ने उसे सब कुछ बता दिया जो हुआ था।
[14] लाबन ने कहा, “आप वाक़ई मेरे रिश्तेदार हैं।” याक़ूब ने वहाँ एक पूरा महीना गुज़ारा।
[15] फिर लाबन याक़ूब से कहने लगा, “बेशक आप मेरे रिश्तेदार हैं, लेकिन आप को मेरे लिए काम करने के बदले में कुछ मिलना चाहिए। मैं आप को कितने पैसे दूँ?”
[16] लाबन की दो बेटियाँ थीं। बड़ी का नाम लियाह था और छोटी का राख़िल।
[17] लियाह की आँखें चुनधी थीं जबकि राख़िल हर तरह से ख़ूबसूरत थी।
[18] याक़ूब को राख़िल से मुहब्बत थी, इस लिए उस ने कहा, “अगर मुझे आप की छोटी बेटी राख़िल मिल जाए तो आप के लिए सात साल काम करूँगा।”
[19] लाबन ने कहा, “किसी और आदमी की निस्बत मुझे यह ज़्यादा पसन्द है कि आप ही से उस की शादी कराऊँ।”
[20] पस याक़ूब ने राख़िल को पाने के लिए सात साल तक काम किया। लेकिन उसे ऐसा लगा जैसा दो एक दिन ही गुज़रे हों क्यूँकि वह राख़िल को शिद्दत से प्यार करता था।
[21] इस के बाद उस ने लाबन से कहा, “मुद्दत पूरी हो गई है। अब मुझे अपनी बेटी से शादी करने दें।”
[22] लाबन ने उस मक़ाम के तमाम लोगों को दावत दे कर शादी की ज़ियाफ़त की।
[23] लेकिन उस रात वह राख़िल की बजाए लियाह को याक़ूब के पास ले आया, और याक़ूब उसी से हमबिसतर हुआ।
[24] (लाबन ने लियाह को अपनी लौंडी ज़िल्फ़ा दे दी थी ताकि वह उस की ख़िदमत करे।)
[25] जब सुब्ह हुई तो याक़ूब ने देखा कि लियाह ही मेरे पास है। उस ने लाबन के पास जा कर कहा, “यह आप ने मेरे साथ क्या किया है? क्या मैं ने राख़िल के लिए काम नहीं किया? आप ने मुझे धोका क्यूँ दिया?”
[26] लाबन ने जवाब दिया, “यहाँ दस्तूर नहीं है कि छोटी बेटी की शादी बड़ी से पहले कर दी जाए।
[27] एक हफ़्ते के बाद शादी की रुसूमात पूरी हो जाएँगी। उस वक़्त तक सब्र करें। फिर मैं आप को राख़िल भी दे दूँगा। शर्त यह है कि आप मज़ीद सात साल मेरे लिए काम करें।”
[28] याक़ूब मान गया। चुनाँचे जब एक हफ़्ते के बाद शादी की रुसूमात पूरी हुईं तो लाबन ने अपनी बेटी राख़िल की शादी भी उस के साथ कर दी।
[29] (लाबन ने राख़िल को अपनी लौंडी बिल्हाह दे दी ताकि वह उस की ख़िदमत करे।)
[30] याक़ूब राख़िल से भी हमबिसतर हुआ। वह लियाह की निस्बत उसे ज़्यादा प्यार करता था। फिर उस ने राख़िल के इवज़ सात साल और लाबन की ख़िदमत की।
[31] जब रब ने देखा कि लियाह से नफ़रत की जाती है तो उस ने उसे औलाद दी जबकि राख़िल के हाँ बच्चे पैदा न हुए।
[32] लियाह हामिला हुई और उस के बेटा पैदा हुआ। उस ने कहा, “रब ने मेरी मुसीबत देखी है और अब मेरा शौहर मुझे प्यार करेगा।” उस ने उस का नाम रूबिन यानी ‘देखो एक बेटा’ रखा।
[33] वह दुबारा हामिला हुई। एक और बेटा पैदा हुआ। उस ने कहा, “रब ने सुना कि मुझ से नफ़रत की जाती है, इस लिए उस ने मुझे यह भी दिया है।” उस ने उस का नाम शमाऊन यानी ‘रब ने सुना है’ रखा।
[34] वह एक और दफ़ा हामिला हुई। तीसरा बेटा पैदा हुआ। उस ने कहा, “अब आख़िरकार शौहर के साथ मेरा बंधन मज़बूत हो जाएगा, क्यूँकि मैं ने उस के लिए तीन बेटों को जन्म दिया है।” उस ने उस का नाम लावी यानी बंधन रखा।
[35] वह एक बार फिर हामिला हुई। चौथा बेटा पैदा हुआ। उस ने कहा, “इस दफ़ा मैं रब की तम्जीद करूँगी।” उस ने उस का नाम यहूदाह यानी तम्जीद रखा। इस के बाद उस से और बच्चे पैदा न हुए।