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[1] “सचेत रहव! तुमन मनखेमन के आघू म ओमन ला देखाय बर अपन धरमीपन के काम झन करव। नइं तो तुमन ला अपन स्वरगीय ददा ले कुछू ईनाम नइं मिलय।

[2] “एकरसेति, जब तुमन जरूरतमंद मनखे ला देथव, त डुगडुगी झन पीटवाव, जइसने कि ढोंगी मनखेमन यहूदीमन के सभा-घर अऊ गलीमन म करथें, ताकि मनखेमन ओमन के बड़ई करंय। मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि ओमन अपन जम्मो ईनाम पा गीन।

[3] पर जब तुमन जरूरतमंद मनखे ला देथव, त तुम्हर डेरी हांथ ये बात ला झन जानय कि तुम्हर जेवनी हांथ का करत हवय।

[4] तुम्हर दान ह गुपत म रहय। तब तुम्हर स्वरगीय ददा, जऊन ह गुपत म करे गय काम ला घलो देखथे, तुमन ला ईनाम दीही।

[5] “जब तुमन पराथना करथव, त ढोंगी मनखेमन सहीं झन करव, काबरकि मनखेमन ला देखाय बर, यहूदीमन के सभा-घर अऊ गली के चऊकमन म ठाढ़ होके पराथना करई, ओमन ला बने लगथे। मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि ओमन अपन जम्मो ईनाम पा गीन।

[6] जब तुमन पराथना करथव, त अपन खोली म जावव, अऊ कपाट ला बंद करके, अपन ददा ले पराथना करव, जऊन ह नइं दिखय। तब तुम्हर ददा, जऊन ह गुपत म करे गय काम ला घलो देखथे, तुमन ला ईनाम दीही।

[7] अऊ जब तुमन पराथना करथव, त आनजातमन सहीं बेमतलब के बातमन ला घेरी-बेरी झन दुहराव, काबरकि ओमन ये सोचथें कि ओमन के बहुंत बात बोले के कारन, परमेसर ह ओमन के सुनही।

[8] ओमन सहीं झन बनव, काबरकि तुम्हर मांगे के पहिली, तुम्हर ददा ह जानथे कि तुमन ला का चीज के जरूरत हवय।

[9] “तुमन ला ये किसम ले पराथना करना चाही: “ ‘हे हमर ददा, तें जो स्वरग म हवस, तोर नांव ह पबितर माने जावय,

[10] तोर राज आवय, जइसने तोर ईछा स्वरग म पूरा होथे, वइसने धरती म घलो पूरा होवय।

[11] हमन ला हर दिन के सहीं आज के भोजन दे।

[12] हमर पापमन ला छेमा कर, जइसने हमन ओमन ला छेमा करे हवन, जऊन मन हमर बिरोध म पाप करे हवंय।

[13] अऊ हमन ला परिछा म झन पड़न दे, पर हमन ला बुरई ले बचा, काबरकि राज, अऊ पराकरम अऊ महिमा सदाकाल तक तोर अय। आमीन।’

[14] यदि तुमन ओ मनखेमन ला छेमा करथव, जऊन मन तुम्हर बिरोध म पाप करे हवंय, त तुम्हर स्वरगीय ददा घलो तुमन ला छेमा करही।

[15] पर यदि तुमन ओ मनखेमन के पाप ला छेमा नइं करव, त तुम्हर ददा घलो तुम्हर पाप ला छेमा नइं करही।

[16] “जब तुमन उपास करथव, त तुमन अपन चेहरा ला उदास झन बनावव, जइसने कि ढोंगीमन करथें; ओमन अपन चेहरा ला ओरमाय रहिथें, ताकि मनखेमन देखंय कि ओमन उपास करत हवंय। मेंह तुमन ला सच कहत हंव कि ओमन अपन जम्मो ईनाम पा चुकिन।

[17] पर जब तुमन उपास करथव, त अपन मुड़ म तेल चुपरव अऊ मुहूं ला धोवव,

[18] ताकि मनखेमन ये झन जानंय कि तुमन उपास करत हवव, पर सिरिप तुम्हर ददा परमेसर ह जानय, जऊन ह नइं दिखय। अऊ तुम्हर ददा, जऊन ह हर गुपत के काम ला देखथे, तुमन ला ईनाम दीही।

[19] “अपन खातिर ये धरती म धन जमा झन करव, जिहां कीरा अऊ मुर्चा येला नास करथें, अऊ चोरमन सेंध मारके चोरा लेथें।

[20] पर अपन खातिर स्वरग म धन जमा करव, जिहां कीरा अऊ मुर्चा येला नास नइं कर सकंय, अऊ न ही चोरमन सेंध मारके चोरी कर सकंय।

[21] काबरकि जिहां तुम्हर धन हवय, उहां तुम्हर मन घलो लगे रहिही।

[22] “आंखी ह देहें के दीया अय। यदि तुम्हर आंखीमन ठीक हवंय, त तुम्हर जम्मो देहें ह अंजोर ले भर जाही।

[23] पर यदि तुम्हर आंखीमन खराप हवंय, त तुम्हर जम्मो देहें ह अंधियार ले भर जाही। एकरसेति, ओ अंजोर जऊन ह तुमन म हवय, यदि अंधियार हो जाथे, त ओह कतेक भयंकर अंधियार होही।

[24] “कोनो भी मनखे दू झन मालिक के सेवा नइं कर सकय। या तो ओह एक झन ले नफरत करही अऊ दूसर झन ले मया; या फेर ओह एक झन बर समरपित रहिही अऊ दूसर झन ला तुछ जानही। तुमन परमेसर अऊ धन दूनों के सेवा नइं कर सकव।

[25] “एकरसेति, मेंह तुमन ला कहत हंव कि तुमन अपन जिनगी के बारे म चिंता झन करव कि तुमन का खाहू या का पीहू, अऊ न अपन देहें के बारे म चिंता करव कि तुमन का पहिरहू। का जिनगी ह भोजन ले जादा महत्व के नो हय? अऊ देहें ह ओनहा ले बढ़के नो हय?

[26] अकास के चिरईमन ला देखव; ओमन न कुछू बोवंय, न लुवंय अऊ न कोठार म जमा करंय; तभो ले तुम्हर स्वरगीय ददा ह ओमन ला खवाथे। का तुमन चिरईमन ले जादा महत्व के नो हव?

[27] तुमन म ले कोन ह चिंता करे के दुवारा अपन जिनगी के एको घरी ला घलो बढ़ा सकथे?

[28] “तुमन ओनहा बर काबर चिंता करथव? खेत के जंगली फूलमन ला देखव कि ओमन कइसने बाढ़थें। ओमन न तो मेहनत करंय अऊ न ही ओनहा बिनंय।

[29] तभो ले मेंह तुमन ला बतावत हंव कि राजा सुलेमान घलो अपन जम्मो सोभा म येमन ले एको झन सहीं नइं सजे-धजे रिहिस।

[30] यदि परमेसर ह भुइयां के कांदी ला, जऊन ह आज इहां हवय अऊ कल आगी म झोंक दिये जाही, अइसने ओनहा पहिराथे, त हे अल्‍प बिसवासीमन ओह तुमन ला अऊ बने ओनहा काबर नइं पहिराही?

[31] एकरसेति तुमन चिंता झन करव अऊ ये झन कहव कि हमन का खाबो? या का पीबो? या का पहिरबो?

[32] आनजातमन ये जम्मो चीज के खोज म रहिथें। तुम्हर स्वरगीय ददा ह जानथे कि तुमन ला ये जम्मो चीजमन के जरूरत हवय।

[33] पहिली परमेसर के राज अऊ ओकर धरमीपन के खोज करव, त ये जम्मो चीजमन घलो संग म तुमन ला दिये जाही।

[34] एकरसेति, कल के चिंता झन करव, काबरकि कल के दिन ह अपन चिंता खुद कर लीही। आज के दुख ह आज खातिर बहुंते हवय।

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