[1] परमेश्वर और प्रभु यीशु मसीह के दास याकूब की तरफ़ से उन बारह गोत्रों को जो जगह-जगह फैले हुए हैं, शांति।
[2] हे मेरे भाइयो-बहनो, जब तुम तरह-तरह की परीक्षाओं में पड़ो, तो इसको पूरी खुशी की बात समझो,
[3] यह जानकर कि तुम्हारे विश्वास के परखे जाने से धीरज की शुरूआत होती है।
[4] लेकिन धीरज को अपना पूरा काम करने दो, कि तुम पूरे और सिद्ध हो जाओ और तुम में किसी तरह की कमी न रहे।
[5] अगर तुम में से किसी को बुद्धि की कमी हो, तो परमेश्वर से माँगे, उसे मिलेगी। वही हैं जो सब को बिना किसी नाराज़गी के उदारता से बुद्धि देते हैं।
[6] लेकिन बिना शक किए हुए विश्वास से माँगे, क्योंकि शक करने वाला समुद्र की लहर की तरह है, जो हवा से बहती और उछलती रहती है।
[7] शक्की इन्सान यह न समझे, कि उसे प्रभु कुछ देंगे।
[8] ऐसा व्यक्ति शक्की होने की वजह से अपने सारे जीवन में डावाँडोल रहता है।
[9] निम्न स्तर पर रहने वाला मसीही, अपने ऊँचे पद के लिए खुश रहे।
[10] जिस तरह से घास का फूल मुर्झा जाता है, अमीर आदमी की भी वही हालत होती है।
[11] जैसे ही सूरज अपनी तेज़ गर्मी के साथ उदय होता है, वह घास को सुखा देता है, और उसका फूल गिर जाता है, और उसकी खूबसूरती खत्म हो जाती है। इसी तरह अमीर भी अपने रास्ते पर चलते-चलते और अपने तरीके से जिंदगी बिताते हुए एक दिन खत्म हो जाएगा।
[12] वह इन्सान सच में आशीषित है जो परीक्षा में टिका रहता है, क्योंकि खरा निकलने पर वह जिंदगी का वह मुकुट पाएगा जिस का वायदा यीशु ने अपने प्रेम करने वालों को दिया है।
[13] जब किसी की परीक्षा हो तो वह यह न कहे, कि परमेश्वर मेरी परीक्षा कर रहे हैं। बुरी बातों में परमेश्वर किसी की परीक्षा नहीं करते हैं और न ही वे किसी की परीक्षा लेते हैं।
[14] हर इन्सान अपनी वासना से खिंचकर और फँसकर परीक्षा में पड़ता है।
[15] फिर वासना गर्भवती होकर पाप को पैदा करती है और जब पाप बढ़ जाता है तो मौत (बर्बादी) तक पहुँचाता है।
[16] हे मेरे भाइयो-बहनो, गुमराह मत हो जाना।
[17] हर एक अच्छा और उत्तम ईनाम आसमान की ज्योतियों के बनाने वाले परमेश्वर की ओर से है, और वह न बदलने वाले हैं।
[18] परमेश्वर ने अपनी ही इच्छा से सच्चे वचन के द्वारा हमें नया जन्म दिया ताकि हम उनकी बनायी गयी सभी चीजों में से एक तरह से पहले फल (किश्त) हों।
[19] हे भाइयो-बहनो, यह तुम्हें मालूम है इसलिए हर एक इन्सान सुनने में दिलचस्पी दिखाने वाला और बोलने में धीमा और गुस्से में धीमा हो।
[20] इसलिए कि जो कुछ परमेश्वर की निगाह में ठीक है वह सब तुम्हारे गुस्से में नहीं किया जा सकता है।
[21] इसलिए तुम्हारी जिंदगी में जो बुराई और सड़ाहट है, उसे दूर करके उस संदेश को नम्रता से अपनाते जाओ जो तुम्हारे मनों में बोया जाता है। यह संदेश तुम्हारे प्राण (बुद्धि, इच्छा शक्ति और भावनाओं) के विकास में मददगार साबित हो सकता है।
[22] बाइबल से सीखी बातों के अनुसार किया करो। सुनकर, उसके हिसाब से न करने वाले अपने आपको धोखा देते हैं।
[23] क्योंकि जो कोई वचन (बाइबल) की बातों का सुनने वाला है और वैसा करने वाला नहीं, वह उस इन्सान की तरह है जो अपना चेहरा शीशे में देखता है।
[24] देखकर चले जाने के बाद वह भूल जाता है कि मैं कैसा दिख रहा था।
[25] लेकिन जो इन्सान परमेश्वर की सिद्ध इच्छा के अनुसार करना भूलता नहीं, उसके काम का परिणाम फ़ायदेमंद होगा।
[26] अगर कोई व्यक्ति अपने को धार्मिक समझता है, लेकिन अपनी जीभ पर लगाम नहीं लगाता तो वह धोखे में है और उसका धार्मिकपन बेकार है।
[27] हमारे परमेश्वर पिता की निगाह में शुद्ध स्थायी धार्मिकपन (भक्ति) यह है कि अनाथों और विधवाओं की परेशानियों में उनकी मदद करें और दुनिया के भ्रष्टाचार से अपने आप को बचाएँ।