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[1] मुझ प्राचीन की ओर से अति प्रिय गयुस को जिसे मैं दिल से चाहता हूँ।

[2] प्रिय दोस्त, सब बातों से बढ़कर मैं यह चाहता हूँ कि जैसे तुम्हारी आत्मिक तरक्की हो रही है, तुम सभी दायरों में और स्वास्थ्य में भी तरक्की करते जाओ।

[3] मुझे उस समय बड़ी खुशी हुई जब भाईयों ने आकर इस सच्चाई के बारे में बताया जो तुम में है और यह भी कि उसी सच्चाई में तुम बने रहते हो।

[4] मुझे इस बात से बढ़कर और किसी बात में खुशी नहीं होती है कि मेरे बच्चे सच्चाई के साथ जीवन बिता रहे हैं।

[5] प्रिय दोस्त, भाईयों और अपरिचित लोगों के लिए जो कुछ तुम करते हो, वह सब ईमानदारी से करते हो।

[6] मसीही लोगों (चर्च) के सामने उन लोगों ने तुम्हारे प्रेम की गवाही दी है। यदि तुम उनकी आगे की यात्रा में उनकी मदद कर सको, तो अच्छा होगा।

[7] इसलिए कि यीशु के नाम की खातिर वे निकल पड़े हैं और अविश्‍वासियों से कुछ मदद नहीं लेते हैं।

[8] इसलिए हमें ऐसे लोगों का स्वागत करना चाहिए, ताकि सत्य के फैलाने में मददगार हों।

[9] मैंने वहाँ के लोगों (चर्च) को लिखा है, लेकिन दियुत्रिफ़ुस जो उन सब में अपने आपको ऊँचा करना माँगता है, हमें अपनाने के लिए तैयार नहीं है।

[10] इसलिए मेरे आने पर मैं उसके कामों को याद कराऊँगा जो वह बुरे शब्दों के साथ हमारे खिलाफ़ करता है। वह इतने में ही सन्तुष्ट नहीं रहता है, परन्तु वह तो स्वयं भी भाईयों का स्वागत नहीं करता और न ही करने वालों को करने देता है, बल्कि उन्हें चर्च से बाहर कर देता है।

[11] प्रिय दोस्त, बुरा नहीं, लेकिन भला करो। जो भला करता है, वह परमेश्‍वर की ओर से है, लेकिन जो बुरा करता है उसने परमेश्‍वर का अनुभव नहीं किया है।

[12] देमेत्रियुस की सभी बड़ाई करते हैं और हाँ, हम भी उसके गवाह हैं। तुम्हें मालूम भी है कि हमारी गवाही सच है।

[13] मुझे तुमको काफ़ी कुछ लिखना था, लेकिन पेन और स्याही से नहीं लिखना चाहता।

[14] मेरी आशा है कि मैं जल्दी ही तुम से मिलूँगा और आमने-सामने हमारी बातचीत होगी। तुम्हें शान्ति मिले। हमारे मित्र तुम्हें सलाम कहते हैं। तुम भी नाम लेकर वहाँ के मित्रों को सलाम करो।