[1] मुझ प्राचीन के तरफ़ से चुनी हुई महिला और उसके बच्चों के नाम, जिनसे मैं दिल से प्रेम करता हूँ, सिर्फ़ मैं ही नहीं, लेकिन वे भी जिन्होंने सच्चाई को पहचान लिया है।
[2] उस सच्चाई के कारण जो हम में वास करती है और हमेशा हमारे साथ रहेगी,
[3] उसी की खातिर पिता परमेश्वर के पुत्र प्रभु यीशु मसीह की कृपा, करूणा और शांति, सत्य और प्रेम में सदैव तुम्हारे साथ रहेंगे।
[4] मुझे इस बात की खुशी है कि मैंने तुम्हारे कुछ बच्चों को उस आज्ञा के अनुसार जो हमें पिता परमेश्वर से मिली थी सच्चाई पर चलते पाया।
[5] अब हे महिला मैं तुम से बिनती करते हुए कोई नयी आज्ञा नहीं, केवल वही जो शुरूआत से हमारे पास है, लिखता हूँ और वह यह कि हम एक दूसरे से प्रेम रखें।
[6] प्रेम यह है कि हम यीशु की आज्ञाओं के अनुसार जियें। यह वही आज्ञा है जिसे तुम ने शुरू से सुना है और जिस पर तुम्हें चलना चाहिए।
[7] क्योंकि दुनिया में बहुत से गुमराह करने वाले उठ खड़े हुए हैं। वे यह नहीं कबूल करते हैं कि यीशु देह में इस धरती पर आए थे। ये ही भरमाने वाले और मसीह विरोधी हैं।
[8] अपने बारे में सावधान रहो, ऐसा न हो कि जो मेहनत हम ने की है, उसे तुम गवाँ दो, लेकिन यह कि पूरा प्रतिफल पाओ।
[9] जो कोई मसीह की सिखायी बातों से दूर भटक जाता है और उसमें बना नहीं रहता उसके पास परमेश्वर नहीं हैं। लेकिन जो मसीह की सिखायी बातों में बना रहता है, उसके पास पिता और पुत्र दोनों ही हैं।
[10] अगर तुम्हारे घर आने वाला इन्सान यही शिक्षा न दे, तो न अपने घर में उसका स्वागत करो और न नमस्कार।
[11] क्योंकि जो ऐेसे मनुष्य की आवभगत करता है, वह उसके बुरे कामों में हाथ बटाता है।
[12] मैं तुम्हें और बहुत कुछ लिखना चाहता हूँ लेकिन कागज़ पर स्याही से नहीं लिखना चाहता हूँ। मेरी ऐसी उम्मीद है कि मैं आमने सामने बात करूँ, ताकि तुम्हारी खुशी पूरी हो जाए
[13] तुम्हारी चुनी हुई बहन के बच्चे तुम्हें सलाम कहते हैं।