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[1] इसलिए जब कि मसीह ने देह में होकर दुख उठाया, तो तुम भी इसी रवैये (मन) को हथियार की तरह ले लो। इसलिए कि जिसने देह में दुख उठाया है, वह गुनाह से आज़ाद हो गया है।

[2] इसलिए इस देह में अपनी बाकी ज़िन्दगी मनुष्यों की अभिलाषाओं में नहीं, लेकिन परमेश्‍वरीय इच्छा के अनुसार बिताओ।

[3] क्योंकि दुनियावी लोगों की शैली - जैसे कामुकता, पियक्कड़पन, रंगरेलियाँ, मद्यपान गोष्ठियाँ तथा घृणित मूर्तिपूजा में जो तुम ने समय गँवाया, वही बहुत हुआ।

[4] इन सब बातों में उनको आश्चर्य होता है कि तुम ऐसे भारी बुरे कामों में अब उनका साथ नहीं देते हो, इसलिए वे तुम्हारी निन्दा करते हैं।

[5] लेकिन यीशु जो जीवित और मरे हुओं का न्याय करेंगे, उन्हीं यीशु के सामने उन लोगों को अपनी करनी का हिसाब देना पड़ेगा।

[6] क्योंकि मर चुके लोगों को भी खुशी की खबर इसलिए सुनायी गयी ताकि देह में तो उनका न्याय मनुष्यों के अनुसार हो, लेकिन आत्मा में वे परमेश्‍वर के मुताबिक जीएँ।

[7] सब कुछ जल्दी (अचानक) खत्म होने वाला है इसलिए समझदार होकर प्रार्थना में लगे रहो।

[8] प्रेम अनगिनित गुनाहों को ढाँप देता है, इसलिए एक दूसरे से प्रेम रखना सब से बड़ी बात होगी।

[9] एक दूसरे की पहुनाई बिना कुड़कुड़ाए करो

[10] जिसको जो वरदान मिला है, वह उसे परमेश्‍वर की तरह-तरह की कृपा के भले भण्डारियों के समान एक दूसरे की सेवा में लगाए।

[11] जिसको सिखाने का काम मिला है वह ऐसा बोले जैसे कि परमेश्‍वर ही उसके माध्यम से बोल रहे हैं। यदि तुम्हें दूसरों की मदद करने की योग्यता मिली है, तो परमेश्‍वर से प्राप्त सारी शक्‍ति से ऐसा करो। तब यीशु मसीह के द्वारा परमेश्‍वर को हर बात में प्रशंसा और सम्मान मिलेगा। सारी महिमा (शान) और अधिकार उन्हीं का है। ऐसा ही हो।

[12] प्रियो, दुख रूपी आग-परीक्षा जिसमें से होकर तुम्हें जाना पड़ रहा है, उसके कारण यह समझकर आश्चर्यचकित न हो कि तुम्हारे साथ कुछ अजीब बातें हो रही हैं।

[13] इसके बजाए, तुम्हें खुश होना चाहिए, क्योंकि इन मुश्किल परिस्थितियों में से गुज़रने से तुम मसीह के साथ उनके दुखों में हिस्सेदार बनोगे। बाद में सारी दुनिया के सामने उनकी अनोखी महिमा के प्रगट होने पर तुम्हें बड़ी खुशी होगी।

[14] यदि यीशु मसीह के कहलाए जाने की वजह से तुम्हें शर्मिन्दा किया जाए, तो खुश होना क्योंकि महिमा का आत्मा जो परमेश्‍वर का आत्मा है तुम में रहता है।

[15] किसी भी तरह से तुम में कोई खूनी, चोर, दुष्टता का काम करने वाला और दूसरों के कामों में दखल देने वाला होने की वजह से दुख न उठाए।

[16] लेकिन यदि कोई मसीही होने के कारण दुख उठाए, तो शर्मिन्दा न हो, लेकिन अपने इस नाम के लिए परमेश्‍वर की महिमा करे।

[17] समय आ चुका है कि परमेश्‍वर के घर से ही इन्साफ़ शुरू हो। इसलिए अगर इन्साफ़ की शुरूवात ही हम से होगी तो उन लोगों का क्या होगा जिन्होंने परमेश्‍वर के सुसमाचार को नहीं अपनाया?

[18] यीशु के लोगों के लिए उनके विश्‍वास के कारण इस दुनिया के जीवन को खतम करके भविष्य के जीवन में दाखिल होने तक बहुत दुख हैं तो मसीह का इन्कार करने वाले भविष्य के जीवन के दुख (न्याय) को कैसे सह पाएँगे?

[19] इसलिए वे भी जो परमेश्‍वर की इच्छानुसार दुख उठाते हैं, सही चाल चलते हुए अपने आपको विश्‍वासयोग्य सृजनहार के सुपुर्द कर दें।

1 पतरस — Chapters