[1] हे पत्नियो, इसी तरह तुम भी अपने पति के अधिकार को स्वीकार करो, उन के भी जो परमेश्वर को मानने के लिए तैयार नहीं हैं।
[2] तुम्हारे बिना कुछ कहे सिर्फ़ तुम्हारे चालचलन ही से वे यीशु को मानने वाले हो जाएँगे।
[3] बाहरी खूबसूरती के बारे में ज्य़ादा मत सोचो जो तरह-तरह के बालों की स्टाइल महँगे जेवरात और सुन्दर कपड़ों से आती है।
[4] शान्त स्वभाव की एक भीतरी खूबसूरती है जो परमेश्वर की निगाह में बहुत कीमती है, वही तुम्हारी पहचान होनी चाहिए।
[5] पुराने समयों में परमेश्वर से प्यार करने वाली महिलाएँ इसी तरह से अपने आपको संवारती थीं। वे परमेश्वर पर भरोसा रखती और पति की आधीनता में रहा करती थीं।
[6] उदाहरण के लिए साराह, अब्राहम को 'मेरे मालिक' कहकर बुलाया करती थी। अगर तुम उसी की तरह वही करो जो ठीक है और किसी बात से भयभीत न हो तो उसी की बेटियाँ ठहरोगी।
[7] इसी तरह से तुम पतियो, अपनी पत्नियों की इज़्ज़त करो। उसके साथ समझदारी के साथ पेश आओ। वह कमज़ोर हो सकती है, लेकिन तुम दोनों परमेश्वर के नए जीवन के वरदान में बराबरी के साथी हो। ऐसा करने से तुम्हारी प्रार्थनाओं के उत्तर में रूकावट नहीं आएगी।
[8] निचोड़ की बात यह है कि तुम सभी को एक मन, सहानुभूति और प्यार से भरा, दयालु और नम्र होना चाहिए।
[9] बुराई के बदले बुराई और बेइज़्ज़ती के बदले बेइज़्ज़ती न करो, लेकिन आशीर्वाद दो क्योंकि ऐसी ही तुम्हारी बुलाहट है और तभी तुम आशीष पाओगे।
[10] क्योंकि जो अपनी भलाई की सोचता है और अच्छे दिन देखना चाहता है, उसे चाहिए कि वह अपनी जीभ को बुराई और होठों को झूठ से बचाए।
[11] उसे दुष्टता से मुड़कर भला करना चाहिए। उसे दूसरों के साथ मेल से रहना चाहिए।
[12] इसलिए कि यीशु मसीह की आँखें माफ़ किए हुए लोगों और उनके कान उनकी दुआओं की तरफ़ लगे रहते हैं। बुरा करने वाले लोगों से वह अपना मुँह मोड़ लेते हैं।
[13] अगर तुम सही और भला करने का मन बना चुके हो तो कौन तुम्हारा कुछ बिगाड़ सकता है।
[14] लेकिन सच तो यह है कि अगर तुम जायज़ काम करने पर तकलीफ़ उठाते हो तो तुम्हें इसका फल मिलेगा। इसलिए न ही घबराओ और न चिन्तित हो।
[15] बजाए इसके यीशु को अपने जीवन का मालिक समझकर उपासना करो। अगर कोई तुम से तुम्हारी उम्मीद के बारे में पूछे तो उसे समझाने के लिए हमेशा तैयार रहो।
[16] लेकिन यह भी इज़्ज़त, दीनता और शुद्ध विवेक के साथ करना, ताकि जो लोग तुम्हारे मसीही चालचलन की खिलाफ़त करते हैं, तुम पर आरोप लगाते समय शर्मिन्दगी महसूस करें।
[17] यदि परमेश्वर को यह मन्ज़ूर है तो हम सही काम करें और तकलीफ़ उठाएँ बजाए इसके कि गलत करने की सज़ा पाएँ।
[18] क्योंकि बेगुनाह यीशु मसीह ने भी गुनाहों के लिए एक बार दुख उठाया। ताकि परमेश्वर के खिलाफ़ बलवा करने वालों के साथ परमेश्वर का मेल हो सके। उन्हों ने देह में तो मौत सह ली, परन्तु पवित्र आत्मा से जिलाए गए।
[19] तभी उन्हों ने जाकर न्यायिक हिरासत में बंद आत्माओं को खुशी की खबर सुनायी।
[20] नूह के जहाज़ बनाए जाने के समय परमेश्वर इन्हीं अनाज्ञाकारियों का इन्तज़ार करते रहे थे, कि वे अपना मन बदलें। लेकिन ऐसा नहीं हुआ और जल प्रलय के बाद केवल आठ ही लोग बच पाए
[21] यह बप्तिस्मे की तरफ़ इशारा है जो खुद मुक्ति पाने को दिखाता है - यह देह की गंदगी साफ़ नहीं करता है लेकिन यह परमेश्वर के आगे शुद्ध विवेक की अपील है। यीशु मसीह के मरे हुओं में से जी उठने की वजह से
[22] जो स्वर्ग पहुँचकर परमेश्वर के साथ सारे अधिकार के साथ विराजमान हैं स्वर्गदूत, प्रधानताएँ एवं ताकतें उनके आधीन हैं।