[1] यह बात सच है कि जो देख-रेख करने वाला (पासबान) बनना चाहता है, वह भले काम की इच्छा करता है।
[2] इसलिए चाहिए कि देख-रेख (चरवाही) करने वाला, आरोप मुक्त, और एक ही पत्नी का पति, संयमी, सुशील, सभ्य, मेहमान नवाज़ी करने वाला, और सिखाने में निपुण हो।
[3] शराबी या मारपीट करने वाला न हो, पैसों का लोभी न हो, बल्कि कोमल स्वभाव का हो। वह झगड़ालू और लालची भी न हो।
[4] वह अपने घर का अच्छा इन्तज़ाम करता हो, और उसके बच्चे पूरी आधीनता के साथ उसका आदर करते हों।
[5] जब कोई अपने ही घर का प्रबन्ध करना न जानता हो, तो परमेश्वर की कलीसिया (चर्च) की देखभाल कैसे करेगा?
[6] दूसरी बात यह, कि देख रेख करने वाला नया शिष्य न हो, ऐसा न हो, कि घमण्ड से भरकर शैतान के समान सज़ा पाए।
[7] बाहर वालों के बीच उसकी गवाही अच्छी हो, ऐसा न हो कि निन्दित होकर शैतान के फँदे में फँस जाए।
[8] वैसे ही सेवकों को भी सम्मानीय होना चाहिए। वे दोरंगी, शराबी और पैसों के लालची न हों,
[9] लेकिन विश्वास के भेद को शुद्ध विवेक से संभालें।
[10] इन्हें भी पहले परखा जाए, उसके बाद यदि निर्दोष निकलें, तो सेवक का काम करें।
[11] इसी प्रकार से उनकी पत्नियों को भी आदरणीय होना चाहिए, निन्दा करने वाली नहीं, परन्तु संयमी और सब बातों में विश्वासयोग्य हों।
[12] सेवक एक ही पत्नी के पति हों और अपने बच्चों पर उचित निगरानी रखते हों और अपने घरों की ज़िम्मेदारी निभाना जानते हों।
[13] क्योंकि जो सेवक का काम अच्छी तरह से कर चुके हैं, वे लोगों से इज़्ज़त पाते हैं और मसीह यीशु में उनके भरोसे के कारण उनका अत्मविश्वास बढ़ता है।
[14] मैं तुम्हारे पास जल्दी आने की आशा रखने पर भी ये बातें तुम्हें इसलिए लिखता हूँ,
[15] कि अगर मेरे आने में देर हो, तो तुम जान लो कि परमेश्वर के घर में, जो जीवित परमेश्वर की कलीसिया (चर्च) है और सत्य का खंभा और नींव है, उसमें कैसा व्यवहार करना चाहिए।
[16] इस में कोई शक नहीं कि खरे जीवन (भक्ति) का भेद गम्भीर है अर्थात् परमेश्वर जो देह में आए, उनके वायदे पवित्र आत्मा के दवारा सच ठहरे, स्वर्गदूतों को दिखाई दिए, गैर-यहूदियों में उनका सन्देश सुनाया गया, दुनिया में उन पर विश्वास किया गया, और महिमा में ऊपर उठाए गए।