[1] देखो, राजा धर्म से शासन करेंगे और अधिकारी न्याय से शासन करेंगे.
[2] सब मानो आंधी से छिपने और बौछार उनके लिये आड़ के समान होगा, मरुभूमि में झरने एक विशाल चट्टान की छाया के समान होंगे.
[3] तब जो देखते हैं, उनकी आंख कमजोर न होगी, और जो सुनते हैं वे सुनेंगे.
[4] उतावले लोगों के मन ज्ञान की बातें समझेंगे, और जो हकलाते हैं वे साफ़ बोलेंगे.
[5] मूर्ख फिर उदार न कहलायेगा न कंजूस दानी कहलायेगा.
[6] क्योंकि एक मूर्ख मूढ़ता की बातें ही करता है, और उसका मन व्यर्थ बातों पर ही लगा रहता है: वह कपट और याहवेह के विषय में झूठ बोलता है जिससे वह भूखे को भूखा और प्यासे को प्यासा ही रख सके.
[7] दुष्ट गलत बात सोचता है, और सीधे लोगों को भी अपनी बातों में फंसा देता है.
[8] किंतु सच्चा व्यक्ति तो अच्छा ही करता है, और अच्छाईयों पर स्थिर रहता है.
[9] हे आलसी स्त्रियों तुम जो निश्चिंत हो, मेरी बात को सुनो; हे निश्चिंत पुत्रियो उठो, मेरे वचन पर ध्यान दो!
[10] हे निश्चिंत पुत्रियो एक वर्ष और कुछ ही दिनों में तुम व्याकुल कर दी जाओगी; क्योंकि दाख का समय खत्म हो गया है, और फल एकत्र नहीं किए जाएंगे.
[11] हे निश्चिंत स्त्रियों कांपो; हे निश्चिंत पुत्रियो व्याकुल हो जाओ! अपने वस्त्र उतारकर अपनी कमर पर टाट बांध लो.
[12] अच्छे खेतों के लिए और फलदार अंगूर के लिये रोओ,
[13] क्योंकि मेरी प्रजा, जो बहुत खुश और आनंदित है, उनके खेत में झाड़ और कांटे उग रहे हैं.
[14] क्योंकि राजमहल छोड़ दिया जायेगा, और नगर सुनसान हो जायेगा; पर्वत और उनके पहरेदारों के घर जंगली, और पालतू पशुओं की चराई की और उनके रहने की जगह बन जाएंगे.
[15] जब तक हम पर ऊपर से आत्मा न उंडेला जाए, और मरुभूमि फलदायक न बन जाए, और फलदायक खेत वन न बन जाए.
[16] तब तक उस जंगल में न्याय रहेगा, और फलदायक खेत में धर्म रहेगा.
[17] धार्मिकता का फल है शांति, उसका परिणाम चैन; और हमेशा के लिए साहस!
[18] तब मेरे लोग शांति से, और सुरक्षित एवं स्थिर रहेंगे.
[19] और वन विनाश होगा और उस नगर का घमंड चूर-चूर किया जाएगा,
[20] क्या ही धन्य हो तुम, जो जल के स्रोतों के पास बीज बोते हो, और गधे और बैल को आज़ादी से चराते हो.