Skip to content
Opens in a new window
Listen to this chapter • 2:42

[1] ऐ तू जो औरतों में सब से ख़ूबसूरत है, तेरा मह्बूब किधर चला गया है? उस ने कौन सी सिम्त इख़तियार की ताकि हम तेरे साथ उस का खोज लगाएँ?

[2] मेरा मह्बूब यहाँ से उतर कर अपने बाग़ में चला गया है, वह बल्सान की क्यारियों के पास गया है ताकि बाग़ों में चरे और सोसन के फूल चुने।

[3] मैं अपने मह्बूब की ही हूँ, और वह मेरा ही है, वह जो सोसनों में चरता है।

[4] मेरी मह्बूबा, तू तिर्ज़ा शहर जैसी हसीन, यरूशलम जैसी ख़ूबसूरत और अलमबरदार दस्तों जैसी रोबदार है।

[5] अपनी नज़रों को मुझ से हटा ले, क्यूँकि वह मुझ में उलझन पैदा कर रही हैं। तेरे बाल उन बकरियों की मानिन्द हैं जो उछलती कूदती कोह-ए-जिलिआद से उतरती हैं।

[6] तेरे दाँत अभी अभी नहलाई हुई भेड़ों जैसे सफ़ेद हैं। हर दाँत का जुड़वाँ है, एक भी गुम नहीं हुआ।

[7] निक़ाब के पीछे तेरे गालों की झलक अनार के टुकड़ों की मानिन्द दिखाई देती है।

[8] गो बादशाह की 60 बीवियाँ, 80 दाश्ताएँ और बेशुमार कुंवारियाँ हों

[9] लेकिन मेरी कबूतरी, मेरी कामिल साथी लासानी है। वह अपनी माँ की वाहिद बेटी है, जिस ने उसे जन्म दिया उस की पाक लाडली है। बेटियों ने उसे देख कर उसे मुबारक कहा, रानियों और दाश्ताओं ने उस की तारीफ़ की,

[10] “यह कौन है जो तुलू-ए-सुब्ह की तरह चमक उठी, जो चाँद जैसी ख़ूबसूरत, आफ़्ताब जैसी पाक और अलमबरदार दस्तों जैसी रोबदार है?”

[11] मैं अख़रोट के बाग़ में उतर आया ताकि वादी में फूटने वाले पौदों का मुआइना करूँ। मैं यह भी मालूम करना चाहता था कि क्या अंगूर की कोंपलें निकल आई या अनार के फूल लग गए हैं।

[12] लेकिन चलते चलते न जाने क्या हुआ, मेरी आर्ज़ू ने मुझे मेरी शरीफ़ क़ौम के रथों के पास पहुँचाया।

[13] ऐ शूलम्मीत, लौट आ, लौट आ! मुड़ कर लौट आ ताकि हम तुझ पर नज़र करें। तुम शूलम्मीत को क्यूँ देखना चाहती हो? हम लश्करगाह का लोकनाच देखना चाहती हैं!

ग़ज़ल-उल-ग़ज़लात — Chapters