[1] क्या इस का मतलब यह है कि हम गुनाह करते रहें ताकि अल्लाह के फ़ज़्ल में इज़ाफ़ा हो?
[2] हरगिज़ नहीं! हम तो मर कर गुनाह से लाताल्लुक़ हो गए हैं। तो फिर हम किस तरह गुनाह को अपने आप पर हुकूमत करने दे सकते हैं?
[3] या क्या आप को मालूम नहीं कि हम सब जिन्हें बपतिस्मा दिया गया है इस से मसीह ईसा की मौत में शामिल हो गए हैं?
[4] क्यूँकि बपतिस्मे से हमें दफ़नाया गया और उस की मौत में शामिल किया गया ताकि हम मसीह की तरह नई ज़िन्दगी गुज़ारें, जिसे बाप की जलाली क़ुदरत ने मुर्दों में से ज़िन्दा किया।
[5] चूँकि इस तरह हम उस की मौत में उस के साथ पैवस्त हो गए हैं इस लिए हम उस के जी उठने में भी उस के साथ पैवस्त होंगे।
[6] क्यूँकि हम जानते हैं कि हमारा पुराना इन्सान मसीह के साथ मस्लूब हो गया ताकि गुनाह के क़ब्ज़े में यह जिस्म नेस्त हो जाए और यूँ हम गुनाह के ग़ुलाम न रहें।
[7] क्यूँकि जो मर गया वह गुनाह से आज़ाद हो गया है।
[8] और हमारा ईमान है कि चूँकि हम मसीह के साथ मर गए हैं इस लिए हम उस के साथ ज़िन्दा भी होंगे,
[9] क्यूँकि हम जानते हैं कि मसीह मुर्दों में से जी उठा है और अब कभी नहीं मरेगा। अब मौत का उस पर कोई इख़तियार नहीं।
[10] मरते वक़्त वह हमेशा के लिए गुनाह की हुकूमत से निकल गया, और अब जब वह दुबारा ज़िन्दा है तो उस की ज़िन्दगी अल्लाह के लिए मख़्सूस है।
[11] आप भी अपने आप को ऐसा समझें। आप भी मर कर गुनाह की हुकूमत से निकल गए हैं और अब आप की मसीह में ज़िन्दगी अल्लाह के लिए मख़्सूस है।
[12] चुनाँचे गुनाह आप के फ़ानी बदन में हुकूमत न करे। ध्यान दें कि आप उस की बुरी ख़्वाहिशात के ताबे न हो जाएँ।
[13] अपने बदन के किसी भी अज़ु को गुनाह की ख़िदमत के लिए पेश न करें, न उसे नारास्ती का हथियार बनने दें। इस के बजाए अपने आप को अल्लाह की ख़िदमत के लिए पेश करें। क्यूँकि पहले आप मुर्दा थे, लेकिन अब आप ज़िन्दा हो गए हैं। चुनाँचे अपने तमाम आज़ा को अल्लाह की ख़िदमत के लिए पेश करें और उन्हें रास्ती के हथियार बनने दें।
[14] आइन्दा गुनाह आप पर हुकूमत नहीं करेगा, क्यूँकि आप अपनी ज़िन्दगी शरीअत के तहत नहीं गुज़ारते बल्कि अल्लाह के फ़ज़्ल के तहत।
[15] अब सवाल यह है, चूँकि हम शरीअत के तहत नहीं बल्कि फ़ज़्ल के तहत हैं तो क्या इस का मतलब यह है कि हमें गुनाह करने के लिए खुला छोड़ दिया गया है? हरगिज़ नहीं!
[16] क्या आप को मालूम नहीं कि जब आप अपने आप को किसी के ताबे करके उस के ग़ुलाम बन जाते हैं तो आप उस मालिक के ग़ुलाम हैं जिस के ताबे आप हैं? या तो गुनाह आप का मालिक बन कर आप को मौत तक ले जाएगा, या फ़रमाँबरदारी आप की मालिकन बन कर आप को रास्तबाज़ी तक ले जाएगी।
[17] दरहक़ीक़त आप पहले गुनाह के ग़ुलाम थे, लेकिन ख़ुदा का शुक्र है कि अब आप पूरे दिल से उसी तालीम के ताबे हो गए हैं जो आप के सपुर्द की गई है।
[18] अब आप को गुनाह से आज़ाद कर दिया गया है, रास्तबाज़ी ही आप की मालिकन बन गई है।
[19] (आप की फ़ितरती कमज़ोरी की वजह से मैं ग़ुलामी की यह मिसाल दे रहा हूँ ताकि आप मेरी बात समझ पाएँ।) पहले आप ने अपने आज़ा को नजासत और बेदीनी की ग़ुलामी में दे रखा था जिस के नतीजे में आप की बेदीनी बढ़ती गई। लेकिन अब आप अपने आज़ा को रास्तबाज़ी की ग़ुलामी में दे दें ताकि आप मुक़द्दस बन जाएँ।
[20] जब गुनाह आप का मालिक था तो आप रास्तबाज़ी से आज़ाद थे।
[21] और इस का नतीजा क्या था? जो कुछ आप ने उस वक़्त किया उस से आप को आज शर्म आती है और उस का अन्जाम मौत है।
[22] लेकिन अब आप गुनाह की ग़ुलामी से आज़ाद हो कर अल्लाह के ग़ुलाम बन गए हैं, जिस के नतीजे में आप मख़्सूस-ओ-मुक़द्दस बन जाते हैं और जिस का अन्जाम अबदी ज़िन्दगी है।
[23] क्यूँकि गुनाह का अज्र मौत है जबकि अल्लाह हमारे ख़ुदावन्द मसीह ईसा के वसीले से हमें अबदी ज़िन्दगी की मुफ़्त नेमत अता करता है।