[1] क़ुरआ डालने से यूसुफ़ की औलाद का इलाक़ा मुक़र्रर किया गया। उस की सरहद यरीहू के क़रीब दरया-ए-यर्दन से शुरू हुई, शहर के मशरिक़ में चश्मों के पास से गुज़री और रेगिस्तान में से चलती चलती बैत-एल के पहाड़ी इलाक़े तक पहुँची।
[2] लूज़ यानी बैत-एल से आगे निकल कर वह अर्कियों के इलाक़े में अतारात पहुँची।
[3] वहाँ से वह मग़रिब की तरफ़ उतरती उतरती यफ़्लीतियों के इलाक़े में दाख़िल हुई जहाँ वह नशेबी बैत-हौरून में से गुज़र कर जज़र के पीछे समुन्दर पर ख़त्म हुई।
[4] यह उस इलाक़े की जुनूबी सरहद थी जो यूसुफ़ की औलाद इफ़्राईम और मनस्सी के क़बीलों को विरासत में दिया गया।
[5] इफ़्राईम के क़बीले को उस के कुंबों के मुताबिक़ यह इलाक़ा मिल गया : उस की जुनूबी सरहद अतारात-अद्दार और बालाई बैत-हौरून से हो कर
[6] समुन्दर पर ख़त्म हुई। उस की शिमाली सरहद मग़रिब में समुन्दर से शुरू हुई और क़ाना नदी के साथ चलती चलती तफ़्फ़ूअह तक पहुँची। वहाँ से वह शिमाल की तरफ़ मुड़ी और मिक्मताह तक पहुँच कर दुबारा मशरिक़ की तरफ़ चलने लगी। फिर वह तानत-सैला से हो कर यानूह पहुँची। मशरिक़ी सरहद शिमाल में यानूह से शुरू हुई और अतारात से हो कर दरया-ए-यर्दन के मग़रिबी किनारे तक उतरी और फिर किनारे के साथ जुनूब की तरफ़ चलती चलती नारा और इस के बाद यरीहू पहुँची। वहाँ वह दरया-ए-यर्दन पर ख़त्म हुई। यही इफ़्राईम और उस के कुंबों की सरहद्दें थीं।
[9] इस के इलावा कुछ शहर और उन के गिर्द-ओ-नवाह की आबादियाँ इफ़्राईम के लिए मुक़र्रर की गईं जो मनस्सी के इलाक़े में थीं।
[10] इफ़्राईम के मर्दों ने जज़र में आबाद कनआनियों को न निकाला। इस लिए उन की औलाद आज तक वहाँ रहती है, अलबत्ता उसे बेगार में काम करना पड़ता है।