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[1] मेरे भाइयो, आप में से ज़्यादा उस्ताद न बनें। आप को मालूम है कि हम उस्तादों की ज़्यादा सख़्ती से अदालत की जाएगी।

[2] हम सब से तो कई तरह की ग़लतियाँ सरज़द होती हैं। लेकिन जिस शख़्स से बोलने में कभी ग़लती नहीं होती वह कामिल है और अपने पूरे बदन को क़ाबू में रखने के क़ाबिल है।

[3] हम घोड़े के मुँह में लगाम का दहाना रख देते हैं ताकि वह हमारे हुक्म पर चले, और इस तरह हम अपनी मर्ज़ी से उस का पूरा जिस्म चला लेते हैं।

[4] या बादबानी जहाज़ की मिसाल लें। जितना भी बड़ा वह हो और जितनी भी तेज़ हवा चलती हो नाख़ुदा एक छोटी सी पतवार के ज़रीए उस का रुख़ ठीक रखता है। यूँ ही वह उसे अपनी मर्ज़ी से चला लेता है।

[5] इसी तरह ज़बान एक छोटा सा अज़ु है, लेकिन वह बड़ी बड़ी बातें करती है। देखें, एक बड़े जंगल को भस्म करने के लिए एक ही चिंगारी काफ़ी होती है।

[6] ज़बान भी आग की मानिन्द है। बदन के दीगर आज़ा के दरमियान रह कर उस में नारास्ती की पूरी दुनिया पाई जाती है। वह पूरे बदन को आलूदा कर देती है, हाँ इन्सान की पूरी ज़िन्दगी को आग लगा देती है, क्यूँकि वह ख़ुद जहन्नुम की आग से सुलगाई गई है।

[7] देखें, इन्सान हर क़िस्म के जानवरों पर क़ाबू पा लेता है और उस ने ऐसा किया भी है, ख़्वाह जंगली जानवर हों या परिन्दे, रेंगने वाले हों या समुन्दरी जानवर।

[8] लेकिन ज़बान पर कोई क़ाबू नहीं पा सकता, इस बेताब और शरीर चीज़ पर जो मोहलक ज़हर से लबालब भरी है।

[9] ज़बान से हम अपने ख़ुदावन्द और बाप की सताइश भी करते हैं और दूसरों पर लानत भी भेजते हैं, जिन्हें अल्लाह की सूरत पर बनाया गया है।

[10] एक ही मुँह से सताइश और लानत निकलती है। मेरे भाइयो, ऐसा नहीं होना चाहिए।

[11] यह कैसे हो सकता है कि एक ही चश्मे से मीठा और कड़वा पानी फूट निकले।

[12] मेरे भाइयो, क्या अन्जीर के दरख़्त पर ज़ैतून लग सकते हैं या अंगूर की बेल पर अन्जीर? हरगिज़ नहीं! इसी तरह नमकीन चश्मे से मीठा पानी नहीं निकल सकता।

[13] क्या आप में से कोई दाना और समझदार है? वह यह बात अपने अच्छे चाल-चलन से ज़ाहिर करे, हिक्मत से पैदा होने वाली हलीमी के नेक कामों से।

[14] लेकिन ख़बरदार! अगर आप दिल में हसद की कड़वाहट और ख़ुदग़रज़ी पाल रहे हैं तो इस पर शेख़ी मत मारना, न सच्चाई के ख़िलाफ़ झूट बोलें।

[15] ऐसा फ़ख़र आसमान की तरफ़ से नहीं है, बल्कि दुनियावी, ग़ैररूहानी और इब्लीस से है।

[16] क्यूँकि जहाँ हसद और ख़ुदग़रज़ी है वहाँ फ़साद और हर शरीर काम पाया जाता है।

[17] आसमान की हिक्मत फ़र्क़ है। अव्वल तो वह पाक और मुक़द्दस है। नीज़ वह अम्नपसन्द, नर्मदिल, फ़रमाँबरदार, रहम और अच्छे फल से भरी हुई, ग़ैरजानिबदार और ख़ुलूसदिल है।

[18] और जो सुलह कराते हैं उन के लिए रास्तबाज़ी का फल सलामती से बोया जाता है।

याक़ूब — Chapters