[1] ज़ैल में हबक़्क़ूक़ नबी की दुआ है। इसे ‘शिगियूनोत’ के तर्ज़ पर गाना है।
[2] ऐ रब, मैं ने तेरा पैग़ाम सुना है। ऐ रब, तेरा काम देख कर मैं डर गया हूँ। हमारे जीते जी उसे वुजूद में ला, जल्द ही उसे हम पर ज़ाहिर कर। जब तुझे हम पर ग़ुस्सा आए तो अपना रहम याद कर।
[3] अल्लाह तेमान से आ रहा है, क़ुद्दूस फ़ारान के पहाड़ी इलाक़े से पहुँच रहा है। (सिलाह) उस का जलाल पूरे आसमान पर छा गया है, ज़मीन उस की हम्द-ओ-सना से भरी हुई है।
[4] तब उस की शान सूरज की तरह चमकती, उस के हाथ से तेज़ किरनें निकलती हैं जिन में उस की क़ुदरत पिनहाँ होती है।
[5] मोहलक बीमारी उस के आगे आगे फैलती, वबाई मर्ज़ उस के नक़्श-ए-क़दम पर चलता है।
[6] जहाँ भी क़दम उठाए, वहाँ ज़मीन हिल जाती, जहाँ भी नज़र डाले वहाँ अक़्वाम लरज़ उठती हैं। तब क़दीम पहाड़ फट जाते, पुरानी पहाड़ियाँ दबक जाती हैं। उस की राहें अज़ल से ऐसी ही रही हैं।
[7] मैं ने कूशान के ख़ैमों को मुसीबत में देखा, मिदियान के तम्बू काँप रहे थे।
[8] ऐ रब, क्या तू दरयाओं और नदियों से ग़ुस्से था? क्या तेरा ग़ज़ब समुन्दर पर नाज़िल हुआ जब तू अपने घोड़ों और फ़त्हमन्द रथों पर सवार हो कर निकला?
[9] तू ने अपनी कमान को निकाल लिया, तेरी लानतें तीरों की तरह बरसने लगी हैं। (सिलाह) तू ज़मीन को फाड़ कर उन जगहों पर दरया बहने देता है।
[10] तुझे देख कर पहाड़ काँप उठते, मूसलाधार बारिश बरसने लगती और पानी की गहराइयाँ गरजती हुई अपने हाथ आसमान की तरफ़ उठाती हैं।
[11] सूरज और चाँद अपनी बुलन्द रिहाइशगाह में रुक जाते हैं। तेरे चमकते तीरों के सामने वह माँद पड़ जाते, तेरे नेज़ों की झिलमिलाती रौशनी में ओझल हो जाते हैं।
[12] तू ग़ुस्से में दुनिया में से गुज़रता, तैश से दीगर अक़्वाम को मार कर गाह लेता है।
[13] तू अपनी क़ौम को रिहा करने के लिए निकला, अपने मसह किए हुए ख़ादिम की मदद करने आया है। तू ने बेदीन का घर छत से ले कर बुन्याद तक गिरा दिया, अब कुछ नज़र नहीं आता। (सिलाह)
[14] उस के अपने नेज़ों से तू ने उस के सर को छेद डाला। पहले उस के दस्ते कितनी ख़ुशी से हम पर टूट पड़े ताकि हमें मुन्तशिर करके मुसीबतज़दा को पोशीदगी में खा सकें! लेकिन अब वह ख़ुद भूसे की तरह हवा में उड़ गए हैं।
[15] तू ने अपने घोड़ों से समुन्दर को यूँ कुचल दिया कि गहरा पानी झाग निकालने लगा।
[16] यह सब कुछ सुन कर मेरा जिस्म लरज़ उठा। इतना शोर था कि मेरे दाँत बजने लगे, मेरी हड्डियाँ सड़ने लगीं, मेरे घुटने काँप उठे। अब मैं उस दिन के इन्तिज़ार में रहूँगा जब आफ़त उस क़ौम पर आएगी जो हम पर हम्ला कर रही है।
[17] अभी तक कोंपलें अन्जीर के दरख़्त पर नज़र नहीं आतीं, अंगूर की बेलें बेफल हैं। अभी तक ज़ैतून के दरख़्त फल से महरूम हैं और खेतों में फ़सलें नहीं उगतीं। बाड़ों में न भेड़-बकरियाँ, न मवेशी हैं।
[18] ताहम मैं रब की ख़ुशी मनाऊँगा, अपने नजातदहिन्दा अल्लाह के बाइस शादियाना बजाऊँगा।
[19] रब क़ादिर-ए-मुतलक़ मेरी क़ुव्वत है। वही मुझे हिरनों के से तेज़रौ पाँओ मुहय्या करता है, वही मुझे बुलन्दियों पर से गुज़रने देता है। दर्ज-ए-बाला गीत मौसीक़ी के राहनुमा के लिए है। इसे मेरे तर्ज़ के तारदार साज़ों के साथ गाना है।