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[1] मुझे सूरज तले एक और बुरी बात नज़र आई जो इन्सान को अपने बोझ तले दबाए रखती है।

[2] अल्लाह किसी आदमी को माल-ओ-मता और इज़्ज़त अता करता है। ग़रज़ उस के पास सब कुछ है जो उस का दिल चाहे। लेकिन अल्लाह उसे इन चीज़ों से लुत्फ़ उठाने नहीं देता बल्कि कोई अजनबी उस का मज़ा लेता है। यह बातिल और एक बड़ी मुसीबत है।

[3] हो सकता है कि किसी आदमी के सौ बच्चे पैदा हों और वह उम्ररसीदा भी हो जाए, लेकिन ख़्वाह वह कितना बूढ़ा क्यूँ न हो जाए, अगर अपनी ख़ुशहाली का मज़ा न ले सके और आख़िरकार सहीह रुसूमात के साथ दफ़नाया न जाए तो इस का क्या फ़ाइदा? मैं कहता हूँ कि उस की निस्बत माँ के पेट में ज़ाए हो गए बच्चे का हाल बेहतर है।

[4] बेशक ऐसे बच्चे का आना बेमानी है, और वह अंधेरे में ही कूच करके चला जाता बल्कि उस का नाम तक अंधेरे में छुपा रहता है।

[5] लेकिन गो उस ने न कभी सूरज देखा, न उसे कभी मालूम हुआ कि ऐसी चीज़ है ताहम उसे मज़कूरा आदमी से कहीं ज़्यादा आराम-ओ-सुकून हासिल है।

[6] और अगर वह दो हज़ार साल तक जीता रहे, लेकिन अपनी ख़ुशहाली से लुत्फ़अन्दोज़ न हो सके तो क्या फ़ाइदा है? सब को तो एक ही जगह जाना है।

[7] इन्सान की तमाम मेहनत-मशक़्क़त का यह मक़्सद है कि पेट भर जाए, तो भी उस की भूक कभी नहीं मिटती।

[8] दानिशमन्द को क्या हासिल है जिस के बाइस वह अहमक़ से बरतर है? इस का क्या फ़ाइदा है कि ग़रीब आदमी ज़िन्दों के साथ मुनासिब सुलूक करने का फ़न सीख ले?

[9] दूरदराज़ चीज़ों के आरज़ूमन्द रहने की निस्बत बेहतर यह है कि इन्सान उन चीज़ों से लुत्फ़ उठाए जो आँखों के सामने ही हैं। यह भी बातिल और हवा को पकड़ने के बराबर है।

[10] जो कुछ भी पेश आता है उस का नाम पहले ही रखा गया है, जो भी इन्सान वुजूद में आता है वह पहले ही मालूम था। कोई भी इन्सान उस का मुक़ाबला नहीं कर सकता जो उस से ताक़तवर है।

[11] क्यूँकि जितनी भी बातें इन्सान करे उतना ही ज़्यादा मालूम होगा कि बातिल हैं। इन्सान के लिए इस का क्या फ़ाइदा?

[12] किस को मालूम है कि उन थोड़े और बेकार दिनों के दौरान जो साय की तरह गुज़र जाते हैं इन्सान के लिए क्या कुछ फ़ाइदामन्द है? कौन उसे बता सकता है कि उस के चले जाने पर सूरज तले क्या कुछ पेश आएगा?

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