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[1] यह ख़त बुज़ुर्ग यूहन्ना की तरफ़ से है। मैं चुनीदा ख़ातून और उस के बच्चों को लिख रहा हूँ जिन्हें मैं सच्चाई से प्यार करता हूँ, और न सिर्फ़ मैं बल्कि सब जो सच्चाई को जानते हैं।

[2] क्यूँकि सच्चाई हम में रहती है और अबद तक हमारे साथ रहेगी।

[3] ख़ुदा बाप और बाप का फ़र्ज़न्द ईसा मसीह हमें फ़ज़्ल, रहम और सलामती अता करे। और यह चीज़ें सच्चाई और मुहब्बत की रूह में हमें हासिल हों।

[4] मैं निहायत ही ख़ुश हुआ कि मैं ने आप के बच्चों में से बाज़ ऐसे पाए जो उसी तरह सच्चाई में चलते हैं जिस तरह ख़ुदा बाप ने हमें हुक्म दिया था।

[5] और अब अज़ीज़ ख़ातून, मैं आप से दरख़्वास्त करता हूँ कि आएँ, हम सब एक दूसरे से मुहब्बत रखें। यह कोई नया हुक्म नहीं है जो मैं आप को लिख रहा हूँ बल्कि वही जो हमें शुरू ही से मिला है।

[6] मुहब्बत का मतलब यह है कि हम उस के अह्काम के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारें। जिस तरह आप ने शुरू ही से सुना है, उस का हुक्म यह है कि आप मुहब्बत की रूह में चलें।

[7] क्यूँकि बहुत से ऐसे लोग दुनिया में निकल खड़े हुए हैं जो आप को सहीह राह से हटाने की कोशिश में लगे रहते हैं। यह लोग नहीं मानते कि ईसा मसीह मुजस्सम हो कर आया है। हर ऐसा शख़्स फ़रेब देने वाला और मुख़ालिफ़-ए-मसीह है।

[8] चुनाँचे ख़बरदार रहें। ऐसा न हो कि आप ने जो कुछ मेहनत करके हासिल किया है वह जाता रहे बल्कि ख़ुदा करे कि आप को इस का पूरा अज्र मिल जाए।

[9] जो भी मसीह की तालीम पर क़ाइम नहीं रहता बल्कि इस से आगे निकल जाता है उस के पास अल्लाह नहीं। जो मसीह की तालीम पर क़ाइम रहता है उस के पास बाप भी है और फ़र्ज़न्द भी।

[10] चुनाँचे अगर कोई आप के पास आ कर यह तालीम पेश नहीं करता तो न उसे अपने घरों में आने दें, न उस को सलाम करें।

[11] क्यूँकि जो उस के लिए सलामती की दुआ करता है वह उस के शरीर कामों में शरीक हो जाता है।

[12] मैं आप को बहुत कुछ बताना चाहता हूँ, लेकिन काग़ज़ और सियाही के ज़रीए नहीं। इस के बजाए मैं आप से मिलने और आप के रू-ब-रू बात करने की उम्मीद रखता हूँ। फिर हमारी ख़ुशी मुकम्मल हो जाएगी।

[13] आप की चुनीदा बहन के बच्चे आप को सलाम कहते हैं।