[1] तुम जो अपने अपराधों और दुष्टता में मरे हुए थे उन्हों ने तुम्हें जीवन दिया।
[2] पिछले समयों में तुम इस संसार के तौर तरीकों, आकाश के अधिकार के शासक (शैतान) यानि वह आत्मा जो अभी भी आज्ञा न मानने वालों में काम करता है, उसी के अनुसार जीवन जीते थे।
[3] और हम सभी उन्हीं में से थे, जिनका जीवन, पुराने स्वभाव, मन की लालसाओं और उनको पूरा करने में बीत रहा था और दूसरों के समान स्वभाव से परमेश्वर की सज़ा के आधीन थे।
[4] लेकिन परमेश्वर ने जो दया में धनी हैं, अपने बड़े प्रेम की वजह से, हमें प्यार दिया।
[5] उस समय भी जब हम अपनी दुष्टता की स्थिति में मरे हुए थे, तब परमेश्वर ने हमें मसीह के साथ जिला दिया (अर्थात् असीम दया के कारण हमें मुक्ति मिली)।
[6] तथा हमें अपने साथ उठाकर स्वर्गिक स्थानों में यीशु मसीह के साथ बैठा दिया।
[7] ताकि आने वाले युगों में वह यीशु मसीह के द्वारा जो हमारे लिये दयालु हैं, उस असीम कृपा के बढ़ते हुए महान धन को दिखा सकें।
[8] इसी अनुग्रह (शर्तहीन कृपा) और विश्वास के द्वारा से तुम्हें मुक्ति मिली है। यह तुम्हारी किसी योग्यता से नहीं, यह मुक्ति परमेश्वर की तरफ़ से ईनाम है।
[9] यह कर्मों से नहीं मिलती है ताकि कोई घमण्ड न कर सके।
[10] हम उनकी कारीगरी हैं और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए बनाए गए हैं, जिन्हें परमेश्वर ने पहले ही से हमारे लिए ठहराया है।
[11] इसलिए याद करो, कि पहले तुम शारीरिक रीति से खतना वालों (यहूदियों) के द्वारा गैरयहूदी और बिना "खतना वाले" कहलाते थे।
[12] उस समय तुम मसीह के बिना इस्राएल से बाहर और प्रतिज्ञा की वाचा के लिए अनजान और इस जीवन में बिना परमेश्वर पिता के और आशाहीन थे।
[13] तुम जो एक समय बहुत दूर थे, अब यीशु मसीह और उन्हीं के खून के द्वारा पास लाए गए हो।
[14] यीशु के द्वारा ही मेल है, जिन्होंने दोनों (यहूदियों-गैरयहूदियों) को एक किया और हमारे बीच बँटवारा करने वाली दीवार को ढा दिया।
[15] जिस यहूदी निमयशास्त्र की व्यवस्था ने गैरयहूदियों को यहूदियों से अलग कर रखा था उसे यीशु ने अपनी मौत से खत्म कर डाला। इन दोनों के बीच मेल करके अपने में 'एक नया इन्सान' बनाया।
[16] यह भी कि यीशु क्रूस द्वारा परमेश्वर के साथ एक देह में सुलह (मेल) कराएँ, जिसकी वजह से उन्हों ने दुश्मनी को (यहूदियों और गैरयहूदियों के बीच) खत्म कर डाला।
[17] तुम गैरयहूदी जो दूर थे और यहूदी जो पास थे, उन सब को खुशी की खबर दी है।
[18] ताकि उन्हीं के द्वारा पिता तक पवित्र आत्मा से हम दोनों की पहुँच हो।
[19] इसलिए अब तुम विदेशी और अजनबी नहीं रहे, लेकिन पवित्र लोगों के संगी नागरिक हो और परमेश्वर पिता के घराने के हो।
[20] यीशु मसीह जिस इमारत का मुख्य पत्थर हैं, उन्हीं में प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर तुम बनाए गये हो।
[21] यीशु में पूरी इमारत बनी है और उन्हीं में ही विश्वासी लोग जुड़कर पवित्र भवन बनते जाते हैं।
[22] तुम भी एक साथ मिलकर परमेश्वर के लिए एक ऐसा निवास स्थान बनाए जाते हो, जहाँ परमेश्वर अपने आत्मा द्वारा रहते हैं।