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[1] जब तू किसी हाकिम के संग भोजन करने को बैठे, तब इस बात को मन लगाकर सोचना कि मेरे सामने कौन है?

[2] और यदि तू अधिक खानेवाला हो, तो थोड़ा खाकर भूखा उठ जाना।

[3] उसकी स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं की लालसा न करना, क्योंकि वह धोखे का भोजन है।

[4] धनी होने के लिये परिश्रम न करना; अपनी समझ का भरोसा छोड़ना। (1 तीमु. 6:9)

[5] जब तू अपनी दृष्टि धन पर लगाएगा, वह चला जाएगा, वह उकाब पक्षी के समान पंख लगाकर, निःसन्देह आकाश की ओर उड़ जाएगा।

[6] जो डाह से देखता है, उसकी रोटी न खाना, और न उसकी स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं की लालसा करना;

[7] क्योंकि वह ऐसा व्यक्ति है, जो भोजन के कीमत की गणना करता है। वह तुझ से कहता तो है, खा और पी, परन्तु उसका मन तुझ से लगा नहीं है।

[8] जो कौर तूने खाया हो, उसे उगलना पड़ेगा, और तू अपनी मीठी बातों का फल खोएगा।

[9] मूर्ख के सामने न बोलना, नहीं तो वह तेरे बुद्धि के वचनों को तुच्छ जानेगा।

[10] पुरानी सीमाओं को न बढ़ाना, और न अनाथों के खेत में घुसना;

[11] क्योंकि उनका छुड़ानेवाला सामर्थी है; उनका मुकद्दमा तेरे संग वही लड़ेगा।

[12] अपना हृदय शिक्षा की ओर, और अपने कान ज्ञान की बातों की ओर लगाना।

[13] लड़के की ताड़ना न छोड़ना ; क्योंकि यदि तू उसको छड़ी से मारे, तो वह न मरेगा।

[14] तू उसको छड़ी से मारकर उसका प्राण अधोलोक से बचाएगा।

[15] हे मेरे पुत्र, यदि तू बुद्धिमान हो, तो मेरा ही मन आनन्दित होगा।

[16] और जब तू सीधी बातें बोले, तब मेरा मन प्रसन्न होगा।

[17] तू पापियों के विषय मन में डाह न करना, दिन भर यहोवा का भय मानते रहना।

[18] क्योंकि अन्त में फल होगा, और तेरी आशा न टूटेगी।

[19] हे मेरे पुत्र, तू सुनकर बुद्धिमान हो, और अपना मन सुमार्ग में सीधा चला।

[20] दाखमधु के पीनेवालों में न होना, न माँस के अधिक खानेवालों की संगति करना;

[21] क्योंकि पियक्कड़ और पेटू दरिद्र हो जाएँगे, और उनका क्रोध उन्हें चिथड़े पहनाएगी।

[22] अपने जन्मानेवाले पिता की सुनना, और जब तेरी माता बुढ़िया हो जाए, तब भी उसे तुच्छ न जानना।

[23] सच्चाई को मोल लेना, बेचना नहीं; और बुद्धि और शिक्षा और समझ को भी मोल लेना।

[24] धर्मी का पिता बहुत मगन होता है; और बुद्धिमान का जन्मानेवाला उसके कारण आनन्दित होता है।

[25] तेरे कारण माता-पिता आनन्दित और तेरी जननी मगन होए।

[26] हे मेरे पुत्र, अपना मन मेरी ओर लगा, और तेरी दृष्टि मेरे चाल चलन पर लगी रहे।

[27] वेश्या गहरा गड्ढा ठहरती है; और पराई स्त्री सकेत कुएँ के समान है।

[28] वह डाकू के समान घात लगाती है, और बहुत से मनुष्यों को विश्वासघाती बना देती है।

[29] कौन कहता है, हाय? कौन कहता है, हाय, हाय? कौन झगड़े-रगड़े में फँसता है? कौन बक-बक करता है? किसके अकारण घाव होते हैं? किसकी आँखें लाल हो जाती हैं?

[30] उनकी जो दाखमधु देर तक पीते हैं, और जो मसाला मिला हुआ दाखमधु ढूँढ़ने को जाते हैं।

[31] जब दाखमधु लाल दिखाई देता है, और कटोरे में उसका सुन्दर रंग होता है, और जब वह धार के साथ उण्डेला जाता है, तब उसको न देखना। (इफिसियों 5:18)

[32] क्योंकि अन्त में वह सर्प के समान डसता है, और करैत के समान काटता है।

[33] तू विचित्र वस्तुएँ देखेगा, और उलटी-सीधी बातें बकता रहेगा।

[34] और तू समुद्र के बीच लेटनेवाले या मस्तूल के सिरे पर सोनेवाले के समान रहेगा।

[35] तू कहेगा कि मैंने मार तो खाई, परन्तु दुःखित न हुआ; मैं पिट तो गया, परन्तु मुझे कुछ सुधि न थी। मैं होश में कब आऊँ? मैं तो फिर मदिरा ढूँढ़ूगा।

नीतिवचन — Chapters