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Listen to this chapter • 6:21

[1] उसके रोष की छड़ी से दुःख भोगनेवाला पुरुष मैं ही हूँ;

[2] वह मुझे ले जाकर उजियाले में नहीं, अंधियारे ही में चलाता है;

[3] उसका हाथ दिन भर मेरे ही विरुद्ध उठता रहता है।

[4] उसने मेरा माँस और चमड़ा गला दिया है, और मेरी हड्डियों को तोड़ दिया है;

[5] उसने मुझे रोकने के लिये किला बनाया, और मुझ को कठिन दुःख और श्रम से घेरा है;

[6] उसने मुझे बहुत दिन के मरे हुए लोगों के समान अंधेरे स्थानों में बसा दिया है।

[7] मेरे चारों ओर उसने बाड़ा बाँधा है कि मैं निकल नहीं सकता; उसने मुझे भारी साँकल से जकड़ा है;

[8] मैं चिल्ला-चिल्ला के दुहाई देता हूँ, तो भी वह मेरी प्रार्थना नहीं सुनता;

[9] मेरे मार्गों को उसने गढ़े हुए पत्थरों से रोक रखा है, मेरी डगरों को उसने टेढ़ी कर दिया है।

[10] वह मेरे लिये घात में बैठे हुए रीछ और घात लगाए हुए सिंह के समान है;

[11] उसने मुझे मेरे मार्गों से भुला दिया, और मुझे फाड़ डाला; उसने मुझ को उजाड़ दिया है।

[12] उसने धनुष चढ़ाकर मुझे अपने तीर का निशाना बनाया है।

[13] उसने अपनी तीरों से मेरे हृदय को बेध दिया है;

[14] सब लोग मुझ पर हँसते हैं और दिन भर मुझ पर ढालकर गीत गाते हैं,

[15] उसने मुझे कठिन दुःख से भर दिया, और नागदौना पिलाकर तृप्त किया है।

[16] उसने मेरे दाँतों को कंकड़ से तोड़ डाला , और मुझे राख से ढाँप दिया है;

[17] और मुझ को मन से उतारकर कुशल से रहित किया है; मैं कल्याण भूल गया हूँ;

[18] इसलिए मैंने कहा, “मेरा बल नष्ट हुआ, और मेरी आशा जो यहोवा पर थी, वह टूट गई है।”

[19] मेरा दुःख और मारा-मारा फिरना, मेरा नागदौने और विष का पीना स्मरण कर!

[20] मैं उन्हीं पर सोचता रहता हूँ, इससे मेरा प्राण ढला जाता है।

[21] परन्तु मैं यह स्मरण करता हूँ , इसलिए मुझे आशा है:

[22] हम मिट नहीं गए; यह यहोवा की महाकरुणा का फल है, क्योंकि उसकी दया अमर है।

[23] प्रति भोर वह नई होती रहती है; तेरी सच्चाई महान है।

[24] मेरे मन ने कहा, “यहोवा मेरा भाग है, इस कारण मैं उसमें आशा रखूँगा।”

[25] जो यहोवा की बाट जोहते और उसके पास जाते हैं, उनके लिये यहोवा भला है।

[26] यहोवा से उद्धार पाने की आशा रखकर चुपचाप रहना भला है।

[27] पुरुष के लिये जवानी में जूआ उठाना भला है।

[28] वह यह जानकर अकेला चुपचाप रहे, कि परमेश्वर ही ने उस पर यह बोझ डाला है;

[29] वह अपना मुँह धूल में रखे, क्या जाने इसमें कुछ आशा हो;

[30] वह अपना गाल अपने मारनेवाले की ओर फेरे, और नामधराई सहता रहे।

[31] क्योंकि प्रभु मन से सर्वदा उतारे नहीं रहता,

[32] चाहे वह दुःख भी दे, तो भी अपनी करुणा की बहुतायत के कारण वह दया भी करता है;

[33] क्योंकि वह मनुष्यों को अपने मन से न तो दबाता है और न दुःख देता है।

[34] पृथ्वी भर के बन्दियों को पाँव के तले दलित करना,

[35] किसी पुरुष का हक़ परमप्रधान के सामने मारना,

[36] और किसी मनुष्य का मुकद्दमा बिगाड़ना, इन तीन कामों को यहोवा देख नहीं सकता।

[37] यदि यहोवा ने आज्ञा न दी हो, तब कौन है कि वचन कहे और वह पूरा हो जाए?

[38] विपत्ति और कल्याण, क्या दोनों परमप्रधान की आज्ञा से नहीं होते?

[39] इसलिए जीवित मनुष्य क्यों कुढ़कुढ़ाए? और पुरुष अपने पाप के दण्ड को क्यों बुरा माने?

[40] हम अपने चाल चलन को ध्यान से परखें, और यहोवा की ओर फिरें!

[41] हम स्वर्ग में वास करनेवाले परमेश्वर की ओर मन लगाएँ और हाथ फैलाएँ और कहें:

[42] “हमने तो अपराध और बलवा किया है, और तूने क्षमा नहीं किया।

[43] तेरा कोप हम पर है, तू हमारे पीछे पड़ा है, तूने बिना तरस खाए घात किया है।

[44] तूने अपने को मेघ से घेर लिया है कि तुझ तक प्रार्थना न पहुँच सके।

[45] तूने हमको जाति-जाति के लोगों के बीच में कूड़ा-करकट सा ठहराया है। (1 कुरि. 4:13)

[46] हमारे सब शत्रुओं ने हम पर अपना-अपना मुँह फैलाया है;

[47] भय और गड्ढा, उजाड़ और विनाश, हम पर आ पड़े हैं;

[48] मेरी आँखों से मेरी प्रजा की पुत्री के विनाश के कारण जल की धाराएँ बह रही है।

[49] मेरी आँख से लगातार आँसू बहते रहेंगे,

[50] जब तक यहोवा स्वर्ग से मेरी ओर न देखे;

[51] अपनी नगरी की सब स्त्रियों का हाल देखने पर मेरा दुःख बढ़ता है।

[52] जो व्यर्थ मेरे शत्रु बने हैं, उन्होंने निर्दयता से चिड़िया के समान मेरा आहेर किया है; (भज. 35:7)

[53] उन्होंने मुझे गड्ढे में डालकर मेरे जीवन का अन्त करने के लिये मेरे ऊपर पत्थर लुढ़काए हैं;

[54] मेरे सिर पर से जल बह गया, मैंने कहा, ‘मैं अब नाश हो गया।’

[55] हे यहोवा, गहरे गड्ढे में से मैंने तुझ से प्रार्थना की;

[56] तूने मेरी सुनी कि जो दुहाई देकर मैं चिल्लाता हूँ उससे कान न फेर ले!

[57] जब मैंने तुझे पुकारा, तब तूने मुझसे कहा, ‘मत डर!’

[58] हे यहोवा, तूने मेरा मुकद्दमा लड़कर मेरा प्राण बचा लिया है।

[59] हे यहोवा, जो अन्याय मुझ पर हुआ है उसे तूने देखा है; तू मेरा न्याय चुका।

[60] जो बदला उन्होंने मुझसे लिया, और जो कल्पनाएँ मेरे विरुद्ध की, उन्हें भी तूने देखा है।

[61] हे यहोवा, जो कल्पनाएँ और निन्दा वे मेरे विरुद्ध करते हैं, वे भी तूने सुनी हैं।

[62] मेरे विरोधियों के वचन, और जो कुछ भी वे मेरे विरुद्ध लगातार सोचते हैं, उन्हें तू जानता है।

[63] उनका उठना-बैठना ध्यान से देख; वे मुझ पर लगते हुए गीत गाते हैं।

[64] हे यहोवा, तू उनके कामों के अनुसार उनको बदला देगा।

[65] तू उनका मन सुन्न कर देगा; तेरा श्राप उन पर होगा।

[66] हे यहोवा, तू अपने कोप से उनको खदेड़-खदेड़कर धरती पर से नाश कर देगा।”

विलापगीत — Chapters