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माँ के लिए नहीं लिखी कविता । तनवीर शेख़ 'इल्हाम’
आज तक
मैंने एक भी कविता
माँ के लिए या उनके नाम पर नहीं लिखी
लिखना भी चाहा तो
नही लिख पाया
बहुत कोशिश की
हर भाषा
हर बोली
हर शब्द के आंगन गया
पर वो अक्षर ढूंढ न सका
जो माँ को परिभाषित कर सके
जो माँ की ममता और
उनके त्याग को रेखांकित कर सके
मैं दूंढ़ ही नहीं पाया
पूरी दुनिया की भाषाओं में
जो ढाल सके माँ को कविताओं में
अंतः मैंने इस प्रयास में पाया
मुझे तो ख़ुद गढ़ा है माँ ने
मैं ही तो हूँ उनकी कविता
उनका अंश
जो गढ़ रहा है कविताएं